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पेयजल शुद्धता की जाँच
District Health Hospital
हर जिला अस्पताल में पेयजल
जॉंच के लिए सुविधा होनी चाहिये

सिर्फ सूक्ष्मजैविक और जैवरासायनिक टैस्टों द्वारा ही यह पता लगाया जा सकता है कि पानी सुरक्षित है या नहीं। जीवाणु नंगी आँखों से नहीं देखे जा सकते। बहुत सी बीमारियॉं इन्ही से फैलती हैं। पानी की जॉंच के लिए एक साफ बोतल में पानी इकट्ठा करें। उसे पास के सामुदायिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला में भेज दें। सूक्ष्मदर्शी जॉंच से यह पता लगाया जा सकेगा कि क्या कोई कीटाणु हैं, तो उनकी संख्या कितनी है और वो कौन से हैं। नमूना लेने के लिए एक साफ बोतल लें जिसका ढक्कन कस कर बन्द होता हो। इस बोतल को औटोक्लेव करके (या प्रेशर कुकर में) जीवाणु रहित कर लें। अगर ऐसा करना सम्भव न हो तो बोतल को २० मिनट तक उबालने के बाद उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर उबालना भी सम्भव न हो तो उस बोतल को उसी पानी से(जिसकी जॉंच होनी है) १५ से २० बार धोएँ। ऐसा करने से बोतल में जो कुछ है वो धुल कर निकल जाएगा।

  • प्रयोगशाला में जॉंच कर के यह पता किया जाता है कि उसमें बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु हैं या नहीं। कोलीफार्म बैक्टीरिया मल से होने वाले प्रदूषण के पक्के सूचक हैं। यानि अगर पानी में ये बैक्टीरिया हैं तो यह पक्का है कि उसमें मल से प्रदूषण हुआ है और उसमें बीमारी पैदा करने वाले अन्य बैक्टीरिया भी होंगे। अगर पेय जल में हैजा के बैक्टीरिया हों तो प्रयोगशाला जितनी जल्दी हो सके भेजने वाले को सूचित करती है। अगर प्रयोगशाला की सुविधा उपलब्ध न हो तो कभी भी पानी के दूषित होने का शक होने पर पानी को उबाल कर या दवा से कीटाणुरहित करके इस्तेमाल करना शुरू कर देना चाहिए। आज कल कोलीर्फोम बैक्टीरिया की जॉंच करने के लिए किट भी उपलब्ध हैं।
  • बर्तनोपर दाग धब्बे पडना, कपडों में दाग, पाखाने के पॅन या बेसिन पर दाग होना, पानी के नल खराब होना आदिसे इन तत्त्वों (लवण और रासायनिक पदार्थ) का पता चलता है।
  • भारत में कई मैदानी इलाकों में भूजल में फ्लोराईड या अर्सेनिक की मात्रा बढने लगी है। इसका कारण भूस्तरीय लवण पानी के स्रोतों के तरफ खींचना है।
  • इसके अलावा पानी में निम्नलिखित लवणों का होना अस्वीकार्य है।
  • नायट्रेट, नायट्राईट, कॅल्शियम या मॅग्नेशियम के संयुग
  • पानी में बदबू का कारण अमोनिया, मिथेन, या हैड्रोजन सल्फाईड गॅस है।
  • पानी में मलजल मिलनेसे ई-कोलाय जीवाणू पाए जाते है। इसकी जॉंच के लिये प्रयोगशाला याने लॅबोरेटरी भेजना पडता है।
  • आजकल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या उपकेंद्रों में पानी के जॉंच के लिये तैयार किट भी मिलतेहै। इसमें कुछ जैवरासायनिक द्रव्य होते है जिसका रंग जीवाणू की बढती संख्या के कारण बदलते है।
  • २४-४८ घंटोंतक एक “बोतल” में पानी डालकर ३५०C तापमान याने शरीर के तापमान में रखे। पानी में अगर जीवाणू है, तब यह पानी १-२ दिनों में कालासा दिखाई देता है।
  • पानी के रासायनिक जॉंच के लिये भी केंद्र सरकारने किट तैयार किया है। इसमें कागजकी सौ पट्टीयॉं होती है, हर एक पट्टी एक टेस्ट के लिये उपयोगी है।

पेयजल को शुद्ध करना

पेयजल को शुद्ध करने के कई एक तरीके मौजूद हैं। कौन सा तरीका इस्तेमाल किया जाए यह इस पर निर्भ्रर करता है कि हमारे पास कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पेयजल सुरक्षित बनाने के कुछ तरीके नीचे दिए गए हैं।

पेयजल अशुद्ध कैसे होता है

रोगजनक जिवाणू और विषाणू घुल मिलनेसे पेयजल अशुद्ध बनता है। ये सूक्ष्म जीव मनुष्य और जानवरोंके मल से पानी में प्रविष्ट होते है। शहरोंमें पेय जल के नलोमें गंदा पानी घुसकर पेयजल असुरक्षित बनाता है। इसिलिये घरेलू सुरक्षा भी जरुरी है।

पानी में रसायन आदि मिलकर भी पानी खराब होता है। लेकिन रासायनिक प्रदूषण जॉंचने के लिये घरेलू तरिके नही है। इसके लिये शासन और निजी लॅब होते है। बोअरवेल पानी का रासायनिक विश्लेषण हर वर्ष एक बार तो करना चाहिये।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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