उन्मूलन और नियंत्रण

किसी बीमारी को पूरी तरह खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका है, उसके रोगाणुओं को दुनिया में से खत्म कर देना। हमने चेचक के वायरस को पूरी तरह जड़ से उखाड ने शुरूवात की है और हम पोलियो के वायरस को निकाल फेंकने की कोशिश में है। यह तरीका यानि रोगाणुओं को पूरी तरह से निर्बीज़ कर देना – बीमारी का उन्मूलन कहलाता है। हम यह केवल उन्हीं रोगाणुओं के लिए कर सकते हैं जो शरीर के बाहर नहीं रह सकते हैं, जब संक्रमणआसानी से पकड़ में आ जाताहैं या फिर इसके लिए अच्छी वैक्सीन उपलब्ध हैं। ज़ाहिर है कि हम हर बीमारी पूरी तरह से मिटा नहीं सकते हैं। अन्य बीमारियों के लिए हमें छोटी-छोटी जीत से सन्तुष्ट होना पड़ता है। मलेरिया, तपेदिक,कोढ़, प्लेग, हैजा, रोहे, डिप्थीरिया, काली खॉंसी,एड्स और कुछ अन्य बीमारियॉं पूरी तरह से खतम नहीं की जा सकतीं। परन्तु हम सही कोशिशों में इनको नियंत्रित कर सकते हैं।

मलेरिया के नियंत्रण के लिए हमें नीचे दिए गए उपाय करने की ज़रूरत होती हैं :संक्रमण के
आश्रय को जितना कम कर सकें करें। जिससे बीमारी के संचरण के लिए कम परजीवी उपलब्ध हों। इसका सबसे अच्छा तरीका है, सभी रोगियों का इलाज करना और संक्रमण कीटकों को न पनपने देना या मारना, मलेरिया की दवा देना ताकि मलेरिया के परजीवी मर जाएँ। संक्रमण के स्रोत पर भी यही लागू होता है।

जहॉं तक वाहक – यहॉं मच्छर का सवाल है, उनका पैदा होने से रोकना सबसे अच्छा तरीका है। इसका मतलब है कि अपने पानी इकट्ठा होता हो वहॉं मच्छर भक्षक मछलियों छोड़ना आदि।अन्त में हमें अपने आपको मच्छरों द्वारा काटे जाने से बचाना ज़रूरी है। इसके लिए मच्छरदानियों और मच्छर भगाने वाली चीज़ों का इस्तेमाल ज़रूरी है।

परपोषक यानि निजी रक्षण

जब हम किसी बच्चे को पोलियो की दवा देते हैं तो हम उसे विशिष्ट बचाव दे रहे होते हैं। यह बीमारी को फैलने से रोकने का एक ओर उपयोगी उपाय है। यह खासतौर पर उन बीमारियों के लिए सही है जिनके रोगाणु किसी एक स्रोत तक सीमित नहीं होते और किसी खास परिस्थिति में संचरण श्रृंखला में भी उन पर हमला नहीं किया जा सकता। उदाहरण के लिए भारत में पोलियो न तो स्रोत ना सिमट सकता है और स्वच्छता के अभाव के कारण इसका संचरण भी नहीं रोका जा सकता। परन्तु पॉंच साल से छोटे बच्चे में वैक्सीन की मदद से सम्भव हुआ है। विशिष्ट बचाव का यौन जनित रोगों को रोकने के लिए कण्डोम का इस्तेमाल करना एक और उदाहरण है ।

रोगाणुनाशक / विसंक्रमण / निर्जीवाणुकरण रोगाणुनाशक/ रोगाणुनाशी /जीवाणुनाशी शरीर के बाहर के संक्रमणकारी कारकों को रसायन या भौतिक तरीको से सीधे नष्ट करने के लिये इस्तेमाल किये जाते है। ये इतने जहरीले है कि इनका उपयोग शरीर के उतकों पर नही करना चाहिये। इनका उपयोग निर्जीव सतह जैसे चिकित्सीय उपकरण और औजार, पट्टीयॉ, रोगीयो् व्दारा इस्तेमाल करने वाले कपडे रोगी के थुक और मलमुत्र आदि ।

विसंक्रमण (रोगाणुनाशक) इसका तात्पर्य किसी व्यक्ति, उसके वस्त्र या व्यक्ति के आस पास के वातावरण या घरेलु जानवर पर स्थित सन्धिपादों या कंन्तकों को नष्ट करने के लिये उपयोग की जानेवाली कोई भौतिक या रसायनिक प्रक्रिया से है।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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