respirationश्वसन तंत्र की गंभीर बीमारियाँ श्वसन तंत्र और उसकी सामान्य बीमारियाँ
श्वसन तंत्र की जाँच

(यह विभाग आम स्वास्थ्य कार्यकर्ताके लिये नही)
श्वसन तंत्र की बीमारियों के लिए ठीक से जॉंच करना ज़रूरी है। ठीक से जॉंच करने पर ही सही निदान, और बीमारी की गम्भीरता का अन्दाज़ा हो सकता है। नियमित जॉंच के लिए एक सिलसिला अपनाना ज़रूरी है।

नाक

नाक की जॉंच – नाक का भरा होना, नाक में बाहरी चीज़ जैसे बीज या पत्थर आदि चले जाने या जुकाम होने के लिए ही करें। अन्दर से नाक कैसी दिखती है यह अच्छी तरह से समझ लें। इसके लिए नाक का सिरा उठाएँ और अन्दर देखें। इस जॉंच के लिए आमतौर पर सूरज की रोशनी काफी होती है। परन्तु इसके लिए टार्च का इस्तेमाल करने से अच्छा रहता है।

जुकाम होने पर नाक का अन्दर का भाग लाल और सूजा हुआ दिखता है। इससे सॉंस लेने में भी तकलीफ होती है। नाक को दो भागों में बॉंटने वाली दीवार कभी-कभी एक तरफ फूल जाती है। अगर यह फूलापन बहुत ज़्यादा हो तो इससे उस तरफ का अन्दर नाक का रास्ता छोटा हो जाता है। और इससे उस तरफ से सॉंस लेने में मुश्किल होती है। अगर यह दीवार बहुत अधिक सख्त हो जाती है तो इसके लिए ऑपरेशन करने की ज़रूरत होती है।

गला

जिस व्यक्ति की जॉंच करनी हो उसे मुँह खोल कर और जीभ बाहर कर के ‘आ’ बोलने को कहें। इससे आपको गला, टॉन्सिल, काकलक (युवुला) और अक्सर स्वरयंत्र का कवर यानि उपकंठ देखने को मिल जाएँगे। इनमें लाली, सूजन और पीप की पपड़ियों की जॉंच करें। आपको सॉंस की हर तकलीफ में गले की जॉंच ज़रूर करनी चाहिए। खास कर बच्चों में ऐसा करना बेहद ज़रूरी है।

टॉन्सिल
smoking disease
गले में दो तर्फा
टॉन्सिल होते है

आपको याद रखना पड़ेगा कि स्वस्थ टॉन्सिल का आकार कितना बड़ा होता है और वो कैसे दिखते हैं। बच्चों में ये थोड़े बड़े होते हैं और उम्र के साथ साथ सिकुड़ जाते हैं। सूजन व लाली होने का अर्थ है कि इनमें शोथ हो गया है। चिरकारी टॉन्सिलाइटिस से टॉन्सिल की सतह मुलायम से खुरदुरी और गढ्ढों वाली हो जाती है।

स्वरयंत्र

स्वरयंत्र की जॉंच करने की ज़रूरत कभी-कभी ही पड़ती है। यह जॉंच हम एक छोटे से शीशे की मदद से कर सकते हैं। इस शीशे का बड़ा सा पकड़ने का डण्डा होता है। रोगी से मुँह खोल कर आ के लिए कहे और शीशे को कुछ क्षणों के लिए गले के अन्दर रखें। इससे स्वरयंत्र का मुँह दिखाई दे जाता है। सॉंस के बाहर छोड़ी जा रही हवा में उपस्थित पानी की भाप एकदम से शीशे को धुन्धला कर देते हैं। अगर ऐसा हो तो शीशे को हटाएँ ओर साफ करके एक बार फिर जल्दी से देखने की कोशिश करें। यह जॉंच आसान है पर इसको सीखने के लिए थोड़ी सी ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है।

फेफड़े

फेफड़े की जॉंच का अर्थ है

  • उनके पूरे क्षेत्र में हवा के घुसने की जॉंच करना और हवा के अन्दर और बाहर आने जाने के फेफड़ों की प्रतिक्रिया की जॉंच करना।
  • आप इन सभी को होते हुए देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं और सुन सकते हैं। इसका मतलब है कि आपके पास फेफड़ों की जॉंच के लिए निरीक्षण करने, परिस्पर्शन और आले से सुनने के तरीके मौजूद हैं। इन तरीकों के अलावा आप फेफड़ों के सारे क्षेत्र में उँगलियों से टोककर फेफड़ों को महसूस भी कर सकते हैं। ‘‘पर्कशन’’ तरीका कहलाता है। यह सारे तरीके साथ साथ इस्तेमाल करने से फेफड़ों के बारे में काफी सारी जानकारी मिल सकती है। इन तरीकों के बारे में और ज़्यादा विवरण आपको चिकित्सा सम्बन्धी किताबों में मिल जाएँगे।
  • छाती के दो तरफ सॉंस मे असमानता से भी फेफड़ों की तकलीफ का पता चलता है। जो तरफ सॉंस लेने पर कम ऊपर उठै उस ओर के फेफड़े में परेशानी है।
  • जिस बच्चे को निमोनिया हो वो जब सॉंस अन्दर खींचता है तो उसकी छाती भी अन्दर की ओर जाती हैं यह बीमारी का पक्का चिन्ह है।
  • दमे के रोगियों की सॉंस की आवाज़ आप दूर से ही सुन सकते हैं। छाती के बहुत अन्दर से आ रही सॉंस की आवाज़ दमे का स्पष्ट चिन्ह है।
  • आप बच्चे को सॉंस लेने हुए कराहना सुन सकते हैं। ज़्यादा जानकारी के लिए बच्चों की बीमारी वाले अध्याय में श्वसन तंत्र के निचले भाग वाला हिस्सा देखें।
  • पर्कशन यानि उँगलियों से टैप करना स्वस्थ्य फेफड़े कुछ ऐसे होते हैं जैसे कि स्पंज में हवा भरी हुई हो। उँगलियों से टैप करने पर उनमें से अनुनाद की आवाज़ आती है। हम स्वस्थ और रोगी फेफड़ों में से आने वाली अलग-अलग आवाज़ में फर्क करना सीख सकते है। आप ऐसा खाली पेट से से गूँजन के द्वारा आने वाली आवाज़ से तुलना करके कर सकते हैं। जब उन्हीं ऊतकों में पीप या कोई और द्रव भरा होता है, जैसा कि निमोनिया, कैंसर या तपेदिक आदि में होता है तो टैपिंग से मंद आवाज़ आती है।
  • छाती में द्रव होने की स्थिति में आने वाली आवाज़ बहुत ही धीमी होती है। और यह अलग ही पहचानी जाती है। बड़ी सी हवा भरी गुफा में से ऐसी आवाज़ होती है जैसे कि किसी खाली बर्तन में से आ रही हो।
  • अपने हाथ से आवाज़ महसूस करें – छाती की आवाज़ों को हाथों से महसूस करने को परिस्पर्शन कहते हैं। रोगी से नाक से आवाज़ निकालने को कहें। और दोनों तरफ का एक जैसा क्षेत्र अपने हाथों से महसूस करें। एक सामान्य स्वस्थ छाती में से आ रही आवाज़ को महसूस करने की कोशिश करें।
  • निमोनिया की स्थिति में भरे हुए फेफड़ों के ऊतकों में से काफी ज़ोरदार हवा के इधर उधर जाने की आवाज़ आएगी। क्या आप जानते हैं कि यह आवाज़ क्यों आती है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ठोस चीज़ों में से होकर हवा ज़्यादा आसानी से बहती है। जैसे अगर आप रेल की पटरी पर अपना कान रखें तो आप को पास आ रही रेल के बारे में ज़्यादा जल्दी पता चल जाएगा।
  • यह भी ध्यान रखें की ठोस चीज के मुकाबले द्रव में से होकर आवाज़ उतनी आसानी से नहीं गुज़रती। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि द्रव आवाज़ की तरंगों को अपने में समेट लेते हैं। इसलिए अगर छाती में द्रव भर गया हो तो आप उस क्षेत्र में से आले की मदद से भी आवाज़ सुन नहीं सकते हैं। इसी कारण से इस क्षेत्र में से सॉंस की कोई आवाज़ नहीं आएगी।
  • आले से जॉंच करना- अगर आपके पास एक आला है तो आपको फेफड़ों की जॉंच के लिए और मदद हो जाएगी। आला आवाज़ की तरंगों को इकट्ठा करके कान तक पहुँचने का यंत्र है। यह हमेशा सम्भव नहीं होता कि रोगी की छाती पर कान रख कर सुना जा सके।
  • आले से पहले डॉक्टर रोगी की छाती पर कान रख कर आवाज़ सुना करते थे। एक बार एक डॉक्टर को एक रानी की जॉंच करनी थी। ऐसे में सीधे छाती पर कान रख कर सुनने की कोई सम्भावना नहीं थी। फिर आला बना और आज यह डॉक्टरी का एक ट्रेडमार्क ही बन गया है। यह काफी उपयोगी होता है पर इसके इस्तेमाल के लिए थोड़े सी ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है। यह कोई जादुई चीज़ नहीं है। सिर्फ सॉंस और दिल में हो रहे चीज़ों को ज़्यादा अच्छी तरह से सुन पाने का एक उपकरण है।
  • आले की मदद से आप क्रैपिटेशन, बुलबुले (सॉंय सॉंय की आवाज) और संकरे नली से हवा गुजरने वाली आवाज खास तरह की सॉंस की आवाज़ पहचान सकते हैं। क्रैपिटेशन महीन और बुलबुले उठने जैसी आवाज़ होती है। यह तब हाती है जब हवा की नलियों में से हवा चिपचिपे श्लेष्मा में से गुज़रती है। यह निमोनिया और तपेदिक में अक्सर आती है। यह आवाज़ ऐसे होती है जैसे कि सूखी घास के हिलने की आवाज़। बूढ़े लोगों के फेफड़ों के आधारी क्षेत्र में ऐसा आम तौर पर होता है। पर यह किसी भी उम्र के लोगों में फेफड़ों की बीमारी का महत्वपूर्ण पहचान है।
  • दमे के रोगियों में दमे की बुलबुले आवाज़ (संकरे नली से हवा गुजरने वाली आवाज) भी एक और आवाज़ है जो आले की मदद से सुनी जा सकती है। यह असल में वो आवाज़ है जो तब आती है जब हवा की उन नलियों में से गुज़रती है जब उनमें कुछ अवरोध होता है। इस पहचान में गलती की कोई सम्भावना नहीं होती। अगर आप इसे एक बार सुन लें तो कभी भूल नहीं सकते।

अगर सूखा फुप्फुसावरणीय शोथ हो तो आले की मदद से फुप्फुसी रगड़ने की आवाज़ सुनाई देती है।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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