old age बुढापा
स्वास्थ्य समस्याएं

जराचिकित्सक बूढ़े लोगों का इलाज करते हैं। बुढ़ापे में स्वास्थ्य समस्याएं जैविक, सामाजिक और पारिवारिक कारणों से होती हैं। बुढ़ापे की आम समस्याओं में शामिल हैं|

  • दांत गिर जाने के कारण पोषण में कमी।
  • नज़र की समस्या, मोतियाबिंद आदि।
  • सुनाई देने में कमी।
  • हड्डियॉं टूटना खासकर बांह और कूल्हे की।
  • उम्र बढ़ने के कारण अवांछित वृद्धि या कैंसर।
  • पुरुषों में पुरस्थ ग्रंथी में वृद्धि।
  • उच्च रक्त चाप, धमनियों का सख्त होना, दिल के दौरे पड़ना।
  • चिरकारी श्वसनिका शोथ और खासी।
  • याददाश्त कम हो जाना।
  • नींद न आना और मानसिक गड़बड़ियॉं।
  • मधुमेह।
  • जोड़ों में दर्द और गठिया।
  • पुरुषों में हर्निया और औरतों में गर्भाशय भ्रंश।
  • पार्किनसन बीमारी – हाथ पैर के कांपने की समस्या।
कुछ समस्याओं का इलाज संभव है
Fake Teeth
नकली दातों से बुढापा झेलना
कुछ आसान होता है

इनमें से कुछ बीमारियॉं वापस ठीक नहीं हो सकतीं क्योंकि वो बुढ़ापे का हिस्सा हैं। परन्तु कुछ के लिए असरकारी उपाय उपलब्ध हैं। जैसे कि दांत गिर जाने पर नकली दांत लगवाना, कूल्हे की हड्डी टूटने पर आपरेशन, सुनने के लिए मशीन, देखने के लिए चश्मा और मोतियाबिंद का ऑपरेशन।

नकली दांत लगने से व्यक्ति न केवल ठीक से खा सकता है बल्कि उसमें बूढ़े होने का अहसास भी कम हो जाता है और सुनने में भी आसानी रहती है। इससे दिखने में चेहरा भी ठीक रहता है। इस तरह बुढ़ापे मे काफी मदद मिलती है। एक बार लगा दिए जाने के बाद नकली दांत कम से कम १० से २० सालों तक चलते हैं। सरकारी अस्पतालोंमें नकली दात यानी डेंचर बिठाया जाता है।

कई बार टूटी हुई हड्डियॉं पारंपरिक हड्डी जोड़ने वालों और विशेषज्ञों द्वारा भी ठीक से नहीं जुड़ पातीं। ऐसे में इन में लगातार दर्द होता रहता है। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि हड्डियॉं टूटें ही नहीं। कुछ खास बीमारियों के निदान में देरी से काफी समस्या हो सकती है। जैसे कि उच्च रक्त चाप, मधुमेह, कैंसर, चिरकारी कानों का संक्रमण, तपेदिक आदि।

थोड़े से दर्द पर भी ध्यान दें

बुढ़ापे में दर्द संवेदना कम हो जाता है। इसलिए अगर स्वास्थ्य समस्या गंभीर हो तो भी दर्द काफी कम हो सकता है – जैसे कि हड्डी टूटने, अलसर या दिल का दौरा पड़ने पर। इसलिए हल्के से दर्द पर भी ध्यान दिया जाना ज़रूरी है।

ठंड

बच्चों की तरह बूढ़ों के लिए भी ठंड सहना मुश्किल होता है। इसलिए उचित देखभाल काफी ज़रूरी होती है। उन्हें अपने को ठंड से ज़रूर बचाना चाहिए।

बिस्तर पर पड़े हुए व्यक्ति की देखभाल
बिस्तर पर बुढों की देखभाल

बूढ़े लोग कई बार लंबी बीमारी, कूल्हे की हड्डी के टूटने और / या अंधेपन या किसी चरम रोग जैसे कि कैंसर की बाद की स्थिति के कारण बिस्तर पर पड़ जाने को मजबूर हो जाते हैं। इस परिस्थिति में उपचार के साथ और काफी कुछ करने की ज़रूरत होती है। नीचे दी गई चीज़ों पर ध्यान दिया जाना ज़रूरी होता है|

  • थोड़ा थोड़ा खाना २ – ३ बार खिलाएं, और जहॉं तक संभव हो तरल पदार्थ दें।
  • दिन में २ से ३ बार मुँह धोएं। अगर दांत नहीं हैं तो बुरुश करने की ज़रूरत नहीं होगी। पर अगर व्यक्ति कुल्ला नहीं कर सकता तो मुँह में उंगली डाल कर सफाई करना ज़रूरी होता है।
  • पाखाना करने पर ध्यान दें। अगर ज़रूरत हो तो शाम को हल्के विरेचक जैसे पैराफीन दें। कभी कभी नीचे से एनीमा देने की भी ज़रूरत होती है। कभी कभी बिस्तर पर बेडपॅन में पाखाना करवाना पड़ सकता है। कभी कभी शय्यामल पात्र लगाने के लिए व्यक्ति को खिसकाना मुश्किल हो सकता है। किसी कुर्सी में बैठने वाले भाग में बीच का हिस्सा काट कर कमोड बनाया जा सकता है। इस छेद के नीचे प्लास्टिक की बाल्टी लगा देनी चाहिए।
  • जब कोई व्यक्ति बिस्तर पर पड़ा हो तो पेशाब करना काफी मुश्किल होता है। पुरुषों के लिए पेशाब करवाने के लिए कंडोम का इस्तेमाल किया जा सकता है। कंडोम का बंद सिरा काट दें और इसे शिश्न पर चढ़ा दें। इसके हुए सिरे पर रबर बैंड या धागे की मदद से एक प्लास्टिक की ट्यूब जोड़ दें। ट्यूब का दूसरा सिरा किसी बोतल में डाल दें। औरतों के लिए चौकोर बर्तन या प्लास्टिक बॉक्स का इस्तेमाल करें। आप प्लास्टिक के उन डिब्बों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं जिनमें मिठाई मिलती है।
  • अगर रोज़ नहलाना संभव न हो तो कम से कम गुनगुने पानी में कपड़ा या स्पंज भिगो कर शरीर पौंछ ज़रूर देना चाहिए।
  • बिस्तर पर पड़े रहने से पीठ पर छाले आदि हो जाते हैं। हर आधे घंटे के बाद व्यक्ति की करवट बदल दें। पानी या हवा से भरी हुए गद्दे से आराम मिलता है। शहरों में पुण्यार्थ संस्थानों से ऐसी चीज़ें उधार ले सकते हैं।
  • खामोशी रखें, बार बार अंदर बाहर जाने से बचें। परन्तु उन्हें अकेला भी न कर दें। दोस्तों और रिश्तेदारों को उनसे मिलने दें।
  • अगर किन्ही दवाइयों की ज़रूरत हो तो वो नियम से उन्हें दें। गोलियों या कैप्सूलों की तुलना में द्रवीय दवाएं लेना आसान होता है।
  • रेडियो या संगीत आदि सुनने से समय काटना आसान हो जाता है। अगर संभव हो तो इनकी व्यवस्था कर दें।
  • जब ज़रूरत हो और अगर संभव हो तो मच्छरदानी लगा दें।
  • नाखून काटने, दाढ़ी बनाने, बाल काटने और ऐसी चीज़ों से बिस्तर पर पड़े व्यक्ति को आराम पहुँचता है।
  • व्यक्ति को बिस्तर से कुर्सी पर और वापस बिस्तर पर लिटाने का कोई तरीका निकालें। बिस्तर आदि बदलने के लिए इसकी ज़रूरत होती है। इस समय में किसी और की मदद लें।
  • जो भी व्यक्ति किसी बूढ़े व्यक्ति की देखभाल कर रहा होता है उसके मन में हमदर्दी, धैर्य और संवेदनशीलता का होना बहुत ज़रूरी है।
मरते हुए व्यक्ति के साथ

मरने वाले व्यक्ति, दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए मृत्यु एक जैविक घटना से कहीं बड़ी चीज़ होती है। दर्शन और धर्म हमेशा ही मौत के साथ जुड़े रहे हैं। आज इनमें आपातकालीन चिकित्सा भी शामिल हो गईं हैं। आपातकालीन दवाएं बहुत से लोगों को असमय मृत्यु से बचा लेती हैं। मृत्यु को लेकर आम सोच में भी बदलाव आया है। एक तो व्यक्ति को मौत से बचाने की कोशिश की जाती है। जिसके पास जो भी उपचार उपलब्ध होता है वो उसका इस्तेमाल करता है। गॉंवों में ऐसा समय काफी मुश्किल का समय होता है क्योंकि न तो ज़रूरी दवाएं उपलब्ध होती हैं और न डॉक्टर।लेकिन आजकल व्यक्ति को कहीं ले जाने के लिए सुविधा हो गयी है। मौत तो अंत में आनी ही है तो क्या हमेशा मरते व्यक्ति का उपचार करते रहना उचित है? यह एक व्यवहारिक और नैतिक सवाल है जिसका जवाब हम नहीं दे पाएंगे।

अगर अंत में मृत्यु पास आ ही गई है तो उसका सामना करना चाहिए। लंबे चरम रोगों जिनसे जल्दी या देरी से मौत होनी ही है और बड़ी उम्र का क्षय रोक पाना संभव नहीं है। इसलिए इन्हें वैसे ही छोड़ देना चाहिए। जब तक व्यक्ति जिंदा है उसकी ज़िंदगी जितनी आरामदेह हो सके बनाने की कोशिश करिए। गंभीर रोग से ग्रस्त बूढे व्यक्ती को अस्पताल में रखना आजकल काफी महँगा हो गया है। कभी इसके लिये लाखो रुपये जुराने पडते है और संचित पूँजी चली जाती है। इसके लिये मरीज के स्थिती के बारे में सही सलाह लेना जरुरी है। अगर इलाज संभव है तो जरुर करे, और सरकारी पुण्यार्थ अस्पताल में भर्ती करे। अगर इससे कुछ फायदा संभव नही तब घर-परिवार में रखना कोई गलत बात नही। इसका जरुर विचार करे।

कई बार बीमार व्यक्ति को लंबे समय तक और नाउम्मीदी की स्थिति में अस्पताल में रखे जाने के बाद वापस घर लाना पड़ता है। यह बेहतर ही होता है कि वो अपने आखरी दिन अपने प्रियजनों के साथ बिताएं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में ऐसे में हमारी भूमिका दर्द कम करने, सहारा देने और देखभाल तक ही सीमित होती है। पर ज़्यादा ज़रूरी है कि यह सब हमदर्दी और समझदारी से किया जाए। इससे तकलीफ कम होती है और हमारी अपनी ज़िंदगी समृद्ध होती है। आम लोगों को बहुत ही साधारण लगने वाली इन्हीं चीज़ों से ही गौतम बुद्ध मानवता के बारे में सोचने के लिए प्रेरित हुए थे।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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