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दवाओं के बारे में और कुछ जानकारी

aboutdrugs मेडिकल स्टोर में मिलने वाली दवाओं में ऍलोपॅथी याने आधुनिक दवाओं के साथ ही आयुर्वेद युनानी सिद्ध या होमिओपॅथी की दवाऍ उपलब्ध होती है। इसके बारे में दवाओं के लेबल पर स्पष्ट सूचना होती है। ऐसा कहते है की कोई भी द्रव्य कम मात्रा में दवा साबित होता है। इसके विपरित जादा मात्रा में जहर हो सकता है। मानवता जितनी पुरानी है, निरोगण की विधाएँ भी उतनी ही पुरानी है। हमेशा से ही मनुष्यों ने बीमारी और मौत से लड़ने के लिए संघर्ष किया है। पूरी दुनिया में अलग अलग समुदायों ने बीमारियों के इलाज के अपने अपने तरीके निकाले हैं।

पिछले सदी में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने काफी तरक्की की है। हम बहुत जटिल चिकित्सा कर सकते हैं, शरीर के अन्दर के भागों की तस्वीर खींच सकते हैं, अंगों का प्रत्यारोपण कर सकते हैं, शरीर के भागों की मरम्मत कर सकते हैं और लगभग मरते हुए व्यक्ति को बचा सकते हैं। चिकित्सा की विभिन्न प्रणालियों की तरह तरह की दवाएँ इलाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत में कई तरह के निरोगण की प्रणलियॉं मौजूद हैं जैसे कि आयुर्वेद, सिद्धा, यूननी और परम्परागत तरीके। इन सब प्रणालियों में जड़ी बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। होम्यापैथी चिकित्सा की एक और प्रणाली है जिसमें बीमारियों के निदान और दवाइयॉं तय करना एकही बात है।

हालॉंकि बीमारियों के उपचार के लिए दवाएँ बेहद ज़रूरी हैं, वही दवाओं के गलत और ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल भी स्वास्थ्य को चुनौती है। इस अध्याय में हम जानेंगे कि दवाएँ शरीर में कैसे काम करती हैं, उनके क्या क्या अवांछित असर होते हैं, दवाओं के बनने के व्यावसायिक पहलू क्या हैं इसी के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य दवाओं के इस्तेमाल के बारे में कुछ बुनियादी जानकारी जरुरी है और साथ ही हम उनका सही और सुरक्षित इस्तेमाल कर सकने में सक्षम हो सकेंगे।

आधुनिक चिकित्सा प्रणाली

आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को ऐलोपैथी भी कहते हैं। यह मुख्यत: पश्चिमी देशों में पिछली दो सदियों में विकसित हुई। इसमें बहुत सी दवाएँ उपचार के पुराने तरीकों से आई। पहले विश्व युद्धके बाद आधुनिक चिकित्या प्रणाली में काफी विकास हुआ। पॉंचवे दशक में प्रति जीवाणु दवाओं के साथ आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में नया दौर आया। ऐलोपैथी में हमारे पास कई सौ दवाएँ मौजूद हैं। और आये दिन नई-नई दवाएँ इस सूची में शामिल होती जा रही हैं।

बीसवीं सदी के शुरुआत तक ऐलोपैथी उपचार की एक कमज़ोर विधा थी। इसमें दूसरी विधाओं से ली गई केवल कुछ एक दवाएँ और जड़ी बूटियों के सत्त शामिल थे। पिछले कुछ दशकों ने इसमें काफी विकास देखा है। इसका श्रेय चिकित्सा वैज्ञानिकों और अन्य विज्ञानों में हुए विकास को जाता है। आज दवाएँ किस तरह शरीर में काम करती हैं, इनके कौन से नुकसानदेह असर हैं, इनकी सही खुराक कितनी होनी चाहिए, दवा के इस्तेमाल के सांखिकीय आकड़े और नई दवाओं आदि की खोज के लिए तरीके मौजूद हैं। एक दवा के परीक्षण में बहुत सारा पैसा और समय लगता है। परन्तु ये सब ज़रूरी है ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि दवा से कोई नुकसान न हो।

नई दवाओं के स्वीकृती की शास्त्रीय नीती

असरकारिता और सुरक्षित होना दवा चुनने के महत्वपूर्ण मापदण्ड होते हैं। हर नई दवा के लिए प्रयोगशाला में कई सारे जॉंच किए जाते हैं। इन दवाओं के जानवरों और इन्सान स्वयंसेवकों पर टैस्ट किया जाता है। डबल ब्लाइण्ड तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तकनीक में लोगों के दो तरह के समूह लिए जाते हैं – एक जिन्हें दवा दी जाती है और दूसरा जिसे कोई निष्क्रिय पदार्थ दिया जाता है। इस परीक्षण का पता न दवा लेने वालों को होता है न टैस्ट करने वालों को। अगर दवा लेने वालों को नतीजे काफी बेहतर आएँ तो इस दवा को सही माना जाता है। किसी दवा को सही घोषित करने से पहले शरीर के विभिन्न अंगों पर होने वाले नुकसानदेह असर आदि का जाएज़ा भी ले लिया जाता है। इन सब परीक्षणों के लिए तयशुदा तरीके और मापदण्ड मौजूद हैं।

आधुनिक दवाओं का निर्माण

आधुनिक दवाओं का निर्माण बहुत ही शास्त्रीय ढंग से किया जाता है। नयी दवा ढुँढने के बाद उसकी अलग अलग तरीके से जॉंच की जाती है और उसको सबसे क्रियाशील मूलतत्व तय किया जाता है। यह लॅबोरेटरीमें उतक या प्राणियों के शरीर में प्रयोग किया जाता है। इसके बाद प्राणियों में बिमारी के संबंध में इसकी ट्रायल्स याने जॉंच की जाती है। इसके साथ दवा की सुरक्षितता भी जॉंची जाती है। इसके बाद मनुष्यों में इसका अध्ययन किया जाता है। इसमे फेज १ ट्रायल में २०-१०० तक स्वयंसेवक के उपर पहले प्रयोग किया जाता है। इससे इसकी मात्रा और सुरक्षितता का प्राथमिक अध्ययन किया जाता है। इसके अनंतर फेज २ में १००-३०० स्वयंसेवकों में प्रयोग होता है जिसमें दवा की औषधीय क्षमता और गौण प्रभाव निश्चित किये जाते है। इसके उपरान्त फेज ३ ट्रायल में १०००-१००० स्वयंसेवकोंमें प्रयोग होता है। जिसमें दवा की कार्यक्षमता का और एक बार अध्ययन और लंबे अर्से की दुष्प्रभावोंको जॉंचा जाता है| इस काम को १२-२५ बरस तक अवधी लग सकता है| इतना सब होनेके बाद फुड अँड ड्रग विधान के अनुसार इसको बाजार में खुला किया जाता है| इन ३ फेज के बाद दवाका इस्तेमाल शुरू होता है लेकिन इसमें भी दवाके दुष्प्रभावोंका अध्ययन जारी रहता है।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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