आँख का स्वास्थ्य कान और उसकी बीमारियाँ

आँखें सबसे महत्वपूर्ण संवेदी अंगों में से एक हैं। हम सब अपनी आँखों पर निर्भर हैं और इनका इस्तेमाल बाहर की दुनिया की छवि दिमाग तक पहुँचाने के लिए करते हैं। आँखें बाहरी दुनिया के लिए हमारे झरोखे हैं। सच है कि आँखों की देखभाल के लिए विशेषज्ञता और उपकरणों की ज़रूरत होती है। परन्तु स्वास्थ्य कार्यकर्ता की भी आँखों की प्राथमिक देखभाल में काफी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

अंध व्यक्ती का पुनर्वसन करना बेहद जरुरी है

भारत जैसे विकासशील देशों में पूर्ण और आँशिक अन्धापन बहुत ही आम समस्या है। विटामिन ए की कमी, सबलवाय (ग्लूकोमा), रोहे और मोतियाबिन्द अन्धेपन के कुछ मुख्य कारण है। विटामिन ए की कमी काफी आसानी से रोकी जा सकती है। रोहे और मोतियाबिन्द के लिए भी इलाज उपलब्ध है। पर कॉर्निया के अपारदर्शी हो जाने का एकमात्र इलाज दूसरा कॉर्निया लगाना (प्रत्यारोपण) ही है। इसलिए नेत्रदान आँखों से सम्बन्धित स्वास्थ्य सेवाओं का एक अभिन्न हिस्सा नेत्रदान है। आँख के बाहरी हिस्सों की बीमारियॉं जैसे गुहेरी (फुन्सी), आँखों के कोश के संक्रमण या फिर खुजली व जलन आदि का इलाज प्राथमिक स्तर पर ही आसानी से हो सकता है। दूर या पास की चीज़ देखने में परेशानी होने का समय से निदान भी स्वास्थ्यकर्ता द्वारा हो सकता है। हालॉंकि इनका इलाज नेत्र चिकित्सक (आँखों का डॉक्टर) ही कर सकता है।

आँखों के अंग
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आँख के अंदरुनी अंग

नेत्रगोलक (आई-बॉल) का एक बड़ा हिस्सा आँखों के सॉकेट (गड्ढा) में छिपा होता है। नेत्रगोल खोपड़ी के हडि्डयों से बने गुफा में आँख के गड्ढे में ज़मी होती हैं। आँखों तक खून का बहाव और तंत्रिकाओं का जोड़, आँख के गड्ढे में घुस रहे खोपड़ी के एक छेद से प्रविष्ट होते है। दिखाई देना और नेत्रगोल का हिलना डुलना दोनों ही तंत्रिकाओं द्वारा ही हो पाता है।

आखों के बाहरी भाग हैं पलकें, पलकों के ऊपर के बाल, आँसू की ग्रंथियॉं- जो कि पलकों के ऊपरी कोनों में होती हैं और आँसुओं की थैली।

नेत्रश्लेष्मा

नेत्रश्लेष्मा एक पतली सी झिल्ली होती है। यह नेत्रगोल के दर्शनीय हिस्से (काले वाले हिस्से को छोड़कर, जो कॉर्निया से ढॅंका होता है) व पलकों को ढॅंके रहती है। इस झिल्ली में खूब सारी खून की शिराएँ होती हैं। अगर इस झिल्ली में किसी तरह का शोथ हो जाए तो ये शिराएँ साफ साफ दिखाई देने लगती हैं। आँसू इस झिल्ली को गीला और साफ रखते हैं। आँखों के किरकिराने में भी यही झिल्ली प्रभावित हो रही होती है।

अश्रूग्रंथी और अश्रूकोश

हमारी ऊपर वाली पलक में आँसूओं की ग्रंथियॉं होती हैं। इन ग्रंथियों में से अगर बहुत ज़्यादा बहाव होने लगे तो वो आँसूओं के रूप में दिखाई देता है। ऐसा रोते समय होता है। जबकि आमतौर पर इतना ही बहाव होता रहता है जिसे नेत्रश्लेष्मा और कॉर्निया गीले रह सकें। आँसूओं के बिना यह झिल्ली और कॉर्निया सूख कर कुछ ही दिनों में खराब होने लगते हैं। ऐसा ज़ीरोफ्थैल्मिया नामक एक रोग में होता है। आँखों का आँसू बनाने वाला हिस्सा आँखों को लगातार धोता रहता है। कुछ कुछ नमकीन पानी नेत्रगोल के सामने की ओर लगातार बहता रहता है। अनंतर यह पानी दोनों पलकों के नासा की तरफ एक छोटी नाली में से अपना रास्ता बनाता है। यह आपको पलकों के अन्दरुनी भाग में एक लाल से रंग के झिल्लीनुमा थैली के रूप में दिखाई देगा। इस कोश में एक छेद भी होता है। इस कोश से एक छोटी सी नली इस द्रव को उस तरफ की नाक तक पहुँचाती है। कभी कभी रोने या किसी दाह शोध आदि से बहुत ज़्यादा आँसू निकलने पर ये आँसू, कोश की नली से नाक में पहुँच जाते हैं। इसीलिये रोते समय नाक में पानी आता है। किसी किसम के शोथ की स्थिति में अगर आँसू कोश बन्द हो जाएँ तो आँसूओं को बहने के लिए कोई दूसरा रास्ता खोजना पड़ता है। इसलिए वो आँखों के रास्ते सीधे बाहर आ जाते हैं। आँख और नाक के बीच की यह नलीका सर्दी जुकाम में प्रभावित होती है। सूजन के कारण बंद हो जाने से आँसू ग्रंथीयॉं का पानी आँखो से ही बहा हम देख सकते है।

पलकें

पलकें आँखों की रक्षा करती है। पलकें बनी होती है त्वचा, एक मजबूत उपस्थि (कार्टिलेज) की परत और कुछ ग्रंथियों, हिलने डुलने के लिए पेशियों की एक परत, अतिरिक्त सुरक्षा के लिए बालों की कतार और अंदरुनी नेत्रश्लेश्मा से।

कॉर्निया

कॉर्निया नेत्रगोल का एक पारदर्शी कॉंच जैसा उत्तल हिस्सा होता है। दृश्यमान चीज़ से अपवर्तित प्रकाश किरण इसी कॉर्निया द्वारा नेत्रगोल में आते है। इसमे खून की कोई भी नलियॉं नहीं होती क्योंकि इनके होने से प्रकाश का रास्ता रूक जाएगा। कॉर्निया बहुत ही कोमल होता है और इसमें चोट लगने या संक्रमण होने से यह अपारदर्शी हो जाता है। विटामिन ए की कमी से कॉर्निया में फोड़े हो जाते हैं जिसे केरेटोमालेशिया कहते हैं। इससे अन्तत: अन्धे होने का भी खतरा होता है। आँसू के निरंतर बहाव के कारण कॉर्निया साफ और सुरक्षित रहता है।

आँख का तारा (आईरिस)

आईरिस याने आँख का तारा कॉर्निया के अन्दर होता है और यह पेशियों और स्पॅंजी ऊतकों का एक गोल आवरण होता है। आप आँख के बीच में आईरिस देख सकते हैं। आँखों पर कितनी रोशनी पड़ रही है उसके अनुसार यह फैल या सिकुड़ जाता है। आईरिस की पेशियॉं बीचों-बीच एक छोटा सा छेद (पुतली या पुतली) छोड़ देती हैं जिसके रास्ते प्रकाश अन्दर जाता है। इसी के रंजक के रंग से- यानि काला, भूरा, सलेटी या नीला- आँखों का रंग तय होता है।

पुतली

पुतली रोशनी पड़ने पर एक तुरन्त होने वाली प्रतिक्रिया (अनैच्छिक क्रिया) के द्वारा फैलता या सिकुड़ती है। आप इस अनैच्छिक क्रिया की जॉंच आँख के एक तरफ से रोशनी डालकर कर सकते हैं। दोनों तरफ की पुतलीयॉं अधिक रोशनी पड़ने पर सिकुड़ जाती है और रोशनी बहुत कम हो यानि अँधेरा हो तो यह फैल जाती है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण लक्षण है। इससे यह जॉंच की जा सकती है कि कोई व्यक्ति ज़िन्दा है या नहीं। मरने के बाद दोनों पुतलीयॉं स्थाई रूप से फैल जाती हैं और रोशनी के प्रति उनकी संवेदनशीलता खतम हो जाती है। जब दिमाग का देखने में सहायक हिस्सा किसी तरह से प्रभावित हो जाए तो इससे यह अनैच्छिक क्रिया गड़बड़ा जाता है। सिर पर चोट आने पर भी रोशनी के तुरंत प्रतिक्रिया गड़बड़ा सकती है।

लैंस

लैंस उत्तल होता है। यह दृष्टीपटल पर प्रकाश की किरणें फोकस (केन्द्रित) करता है। दूर की चीज़ से आ रही प्रकाश की किरणें इस लैंस में से गुज़र कर दृष्टीपटल पर केन्द्रित हो जाती है। आँख के पास पड़ी चीज़ में से किरणें फैली हुई होंगी और तब छवि का दृष्टीपटल पर केन्द्रित होना ज़रूरी है। आँखें लैंस की गोलाई बढ़ा कर (लैंस को मोटा करके) ऐसा करती हैं। आईरिस के सिकुड़ने से लैंस का आकार बदलता है।

लैंस का चैंबर

लैंस पारदर्शी होता है। इसमें कोई भी खून की नलियॉं नहीं होतीं। यह अपने आस पास स्थित द्रव में से पोषक तत्व ग्रहण करता है। यह जलीय द्रव लैंस और कार्निया के बीच स्थित चैंमबर में इकट्ठा रहता है। लैंस पर इस द्रव के दवाब का बढ़ना ग्लूकोमा नामक रोग कहलाता है। मोतियाबिन्द लैंस के सफेद और अपारदर्शी होने को कहते हैं।

विट्रीअस और दृष्टीपटल

आँख के अन्दर का भाग एक पारदर्शी (अँगूरों के गूदे जैसी) पदार्थ का बना होता है जिसे अंग्रेजी में विट्रीअस कहते हैं। यह लैंस द्वारा आने वाली रोशनी को दृष्टीपटल तक पहुँचाती है। दृष्टीपटल तंत्रिकाओं की एक परत है जो रोशनी में बदलाव को महसूस कर सकता है। दृष्टीपटल की कोशिकाएँ दिमाग से दृष्टि तंत्रिका द्वारा जुड़ी होती हैं।

ऑपटिक तंत्रिका (नर्व)

ये तंत्रिका नेत्रगोल को दिमाग के दृष्टीकेन्द्र से जोड़ती है। यह आँखों के खोल (साकेट) के पीछे से गुज़रती है। दृष्टीपटल खून की शिराओं से भरा होता है। उच्च रक्त चाप और मधुमेह (डायबटीज़) की स्थिति में इन शिराओं पर असर पड़ता है और इनको नुकसान हो सकता है। विटामिन ए की कमी से भी आँखों की रोशनी कम हो जाती है।

नेत्रगोल का संचलन (हिलना डुलना)

सॉकेट के अन्दर नेत्रगोल अपनी पेशियों की मदद से हिल डुल सकती है। इसी हिलने-डुलने की बदौलत हम दूर या पास चीज़ों को फोकस कर सकते हैं। दिमाग से आने वाली कपाल तंत्रिकाएँ नेत्रगोल का यह हिलना डुलना नियंत्रित करती हैं। दिमाग के जिस भाग की बदौलत हम देख पाते हैं वो मस्तिष्क के पीछे की ओर होता है।

आँखों की सामान्य देखभाल
  • हर रोज़ दो या तीन बार साफ पानी से आँख धोएँ।
  • आँखों की किसी भी तकलीफ को नज़रअन्दाज नहीं करिए, यह खतरनाक हो सकता है।
  • रोज़ विटामिन ए युक्त भोजन करें।
  • छ: साल से छोटे बच्चों को विटामिन ए युक्त प्रतिरोधक की डोज़ हर छ: माह में दें।
  • नेत्रदान को लोकप्रिय बनाएँ
दृष्टिदोष

किसी वस्तु को देखने के लिए उस वस्तु से निकली प्रकाश किरणों का दृष्टीपटल पर फोकस हो पाना ज़रूरी है। कभी-कभी ये किरणें दृष्टीपटल के पीछे या सामने फोकस होने लगती हैं। अगर ये किरणें दृष्टीपटल के सामने पहुँचनेके पहिले ही फोकस होने लगती हैं तो व्यक्ति को दूर की चीज़ें देखने में परेशानी होने लगती है। इसे निकट दृष्टिता या मायोपिया कहते हैं। ये छोटी उम्र में ज़्यादा होता है।

इसके उलटे अगर ये किरणें दृष्टीपटल के पीछे फोकस होने लगती हैं तो व्यक्ति को पास की चीज़ें देखने में परेशानी होने लगती है। यह स्थिति किसी भी उम्र में हो सकती है। इसे दूर दृष्टिता या हाइपरमेट्रोपिया कहते हैं। चालीस साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में पास की चीज़ों को ठीक से न देख पाने की समस्या आम है। इसका कारण लैंस का लचीलापन इस उम्र में कम होना होता है।

दृष्टि (नज़र) की जॉंच
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आँख की जॉंच

आँखों के क्लीनिक में डॉक्टर दृष्टि की जॉंच खास उपकरणों से करते हैं। अब पुरानी मशीनों की जगह कम्प्यूटर वाली मशीनें हैं। परन्तु दृष्टि की जॉंच अन्य तरीकों से भी हो सकती है जो आसान भी है और जिनके लिए भारी भरकम उपकरणों की ज़रूरत भी नहीं होती है। इनमें से कुछ तरीके ये हैं।

स्नेलेन का चार्ट
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दृष्टीपरीक्षण

स्नेलेन का चार्ट में अक्षर या बिन्दु ऊपर के नीचे की ओर घटते हुए आकार में बने होते हैं। छ: मीटर की दूरी पर खड़े होकर अगर आप उस लाईन के अक्षर पढ़ पाते हैं जिस पर ६ एम (मीटर) का निशान लगाया है तो आपकी दृष्टि है। दोनों आँखों की दृष्टि अलग-अलग टैस्ट की जानी चाहिए। कुछ लोग छ: मीटर की दूरी से ६ एम लाईन से छोटे प्रिंट भी पढ़ सकते हैं, इस ६/६ का अर्थ है कि इनकी नज़र औसत लोगों की नज़र से बेहतर है। ६/६ सामान्य व औसत दृष्टि है। अगर कोई व्यक्ति ६ मीटर वाली लाईन ठीक से नहीं पढ़ पाता और उससे ऊपर वाली लाईन के अक्षर यानि उससे बड़े अक्षर ही पढ़ पाता है तो इसका अर्थ है कि उसकी नज़र उतनी कमज़ोर है। उदाहरण के लिए अगर कोई व्यक्ति छ: मीटर की दूरी से सिर्फ सबसे ऊपर की लाईन ही पढ़ पाता है जिसपर ६० मीटर का निशान लगाया गया है और उसके नीचे की लाईनों के अक्षर नहीं पढ़ पाता तो उसकी दृष्टि ६/६० है। यह तरीका आसान और आम है। स्कूलों में भी ये चार्ट मिलते है।

तुलना के लिए अपनी दृष्टि का इस्तेमाल
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दृष्टी परीक्षण के लिए छोटे बडे
अक्षरों का रोशनीवाला चार्ट

अगर आपके पास चार्ट न हो तो आप पास और दूर की चीज़ों जैसे दीवार के कैलेण्डर का इस्तेमाल कर सकते हैं। ध्यान रहे कि आपकी अपनी नज़र सामान्य हो या अगर कम हो तो चष्मा पहना है। टैस्ट करते समय ध्यान रखें कि व्यक्ति वो चीज़ें आराम से देख पा रहा है जो आप देख पा रहे हैं। कक्षा में आप बच्चों से ब्लैकबोर्ड पर लिखा हुआ पढ़ने को कह सकते हैं। बच्चों में ज्यादातर दृष्टी दोष दूर की चीज़ दिखाई न देने का होता है। वयस्कों में पास की चीज़ों का न देख पाने का दोष ज़्यादा होता है। आप इसकी जॉंच उन्हें सूई में धागा डालने को कह कर या कोई किताब या अखबार पढ़वाकर या चावल या दाल बिनवाकर कर सकते हैं।

उँगलियॉं गिनने का टैस्ट

कुछ लोगों की दृष्टि इतनी कमज़ोर होती है कि उसकी जॉंच ऊपर दिए किसी भी तरीके से नहीं हो सकती। इनके लिये आपको उँगलियॉं गिनने के तरीके का इस्तेमाल करना पड़ेगा। आप व्यक्ति की समस्या का अन्दाज़ा पास व दूर से यह टैस्ट करके लगा सकते हैं। इस टैस्ट से यह पता चल सकता है कि व्यक्ति देख भी पाता है या नहीं। अगर किसी को रोशनी भी दिखाई नहीं देती है तो इस समस्या को डॉक्टर भी कुछ नहीं कर सकते। इसका दोष दृष्टीपटल या नेत्र तंत्रिका में ही होगा।

रंग देखने की क्षमता

रंग देखने की क्षमता की जॉंच हम खास तरह के रंगों के चार्ट द्वारा कर सकते हैं। यह चित्र अलग अलग रंगों के दानों से बने होते हैं। रंगों को ठीक से न पहचान पाने की क्षमता को कलर ब्लॉंइडनैस(रंगांधता) कहते हैं। यह बहुत आम समस्या नहीं है। पर इसका टैस्ट गाडी चलाने के लिए ज़रूरी है।

बच्चों में नजर की कमजोरी

स्कूली उम्र के बच्चों में आम समस्या दूर की चीज़ें ठीक से न देख पाने (मायोपिया) की होती है। दृष्टीदोष पहचानने के लिये नीचे दी गई शिकायतों पर ध्यान दें।children-eyeweakness

  • बच्चा ब्लैक बोर्ड नहीं देख पाता है। (कई बार ऐसे बच्चे को उनके अध्यापक पढ ना पाने के कारण डॉंटते रहते हैं)।
  • भैंगापन children-eyeweakness
  • बच्चा अक्सर अपनी आँख मलता रहता है।
  • बच्चा किताब आँख के बहुत पास रख कर पढ़ता है।
  • पास की चीज़ें साफ न देख पाने की समस्या भी बच्चों में हो सकती है। हालॉंकि यह मायोपिया की तुलना में काफी कम होती हैं।
  • जिन बच्चों में विटामिन ए की कमी होती है उनमें रतौंधी की समस्या भी हो सकती है।

हमें बच्चों में इन समस्याओं की जॉंच के लिए खास कोशिशें करनी चाहिए। ईलाज में देरी से नज़र को और नुकसान हो सकता है। स्कूल के बच्चों की नियमित जॉंच होनी चाहिए। स्वास्थ्य कार्यकर्ता भी कुछ मुद्दों की जॉंच कर सकते हैं।

वयस्कों में दृष्टीदोष

adults-drishtidosh चालीस उम्र के बाद पास की चीज़ें साफ न देख पाने या पढ़ने में मुश्किल होना आम बात है। इसे दूरदृष्टि दोष कहते हैं। इसके लक्षण हैं सिर में दर्द होना, नींद सी आना, बारीकीवाला काम करने में ध्यान न लग पाना। पढ़ना एक ऐसी ही क्रिया है। कई औरतों को पास की नज़र कमज़ोर होने पर दाल चावल में से कंकड़ निकालने या सूई में धागा पिरोने में दिक्कत होने लगती है। ऐसे सभी लोग चीज़ों को दूर रखकर देखने की कोशिश करते हैं। यह समस्या आसानी से सुधारी जा सकती हैं। पर नज़र की कमज़ोरी (जिसे नम्बर से नापा जाता है,) पहले बढ़ती जाती है और फिर स्थिर हो जाती है। नज़र की कमज़ोरी के सुधार के लिए चश्मे या कॉनटेक्ट लैंस की ज़रूरत होती है। आजकल इसके कई नमूने उपलब्ध है। कॉन्टेक्ट लेंस प्लास्टिक का एक छोटा टुकडा है जो कॉर्निया पर लगा सकते है। वयस्कों में, बूढे लोगों में मोतियाबिन्द व सबलवाय (ग्लूकोमा) की समस्या भी हो जाती है।

रतौंधी
विटामिन ए

vitamin-a विटामिन ए आँखों के ठीक ढ़ंग से काम करने के लिए ज़रूरी है। बच्चे विटामिन ए की कमी से बहुत जल्दी प्रभावित हो जाते हैं। हमें कॉर्निया और दृष्टीपटल के स्वास्थ्य के लिए विटामिन ए की ज़रूरत होती है। हरी सब्ज़ियों, पीले और लाल फलों (पपीते और आम),गाजर, और कलेजी में काफी सारा विटामिन ए होता है। संजने की फली में खूब सारा विटामिन ए होता है और ये फलियॉं लगभग सभी जगह मिलती हैं।

रतौंधी यानि रात में ठीक से दिखाई न देना विटामिन ए की कमी का एक सबसे पहला लक्षण होता है। व्यक्ति कम रोशनी में चलते हुए लड़खड़ाता है और रूक-रूक कर चलता है। विटामिन ए की कमी से श्वेतपटल पर मोम जैसे सफेद दाग बन जाता हैं। इन्हें बिटोट दाग कहते हैं। विटामिन ए की कमी से कार्निया सूख जाता है, उसमें झुर्रियॉं पड़ जाती हैं, अलसर हो जाते हैं और वह अपारदर्शी हो जाता है।

विटामिन ए की आपूर्ति

एक से छ: साल की उम्र तक विटामिन ए की छ: महीने की खुराक (दो लाख यूनिट) दिया जाना अन्धेपन की रोकथाम के कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विटामिन ए की आपूर्ति से कई तरह के संक्रमण से होने वाली मौतों से बच्चों को बचाया जा सकता है। तेल में घुलने वाला विटामिन होने के कारण यह काफी लम्बे समय तक शरीर का वसा में रह सकता है।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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