health services स्वास्थ्य सेवाएं

भारत में कई सामाजिक, राजनैतिक, भौगोलिक और प्रशासनिक कारणों से स्वास्थ्य सेवा एक उपेक्षित क्षेत्र रहा है। देश के अधिकांश भागों में स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी बुनियादि हालातों जैसे सुरक्षित पानी, अच्छा पोषण और मल मूत्र आदि के सुरक्षित निपटारे आदि का अभाव है। इसलिये संक्रामक और कुपोषण आदि बीमारियों का भारत में जादा प्रचलन है। इन हालातों में स्वास्थ्य सेवाएं रोगों से बचाव की जगह रोगों को ठीक करने में ही केन्द्रित हैं। ज़रूरी यह है कि किसी देश के स्वास्थ्य कार्यक्रम में बचाव और इलाज दोनों शामिल हों –

  • बचाव संबंधित स्वास्थ्य सेवाएं जैसे टीकाकरण, महामारियों से बचाव और सार्वजनिक स्वास्थ्य के उपाय किए जाना शामिल होता है।
  • स्वास्थ्य बढ़ाना, जैसे की पोषण संबंधी कार्यक्रम और स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देना आदि।
  • स्वास्थ्य शिक्षा और जानकारी।
  • सही प्राथमिक इलाज।
  • सही समय अस्पताल में भेजना।

स्वास्थ्य सेवाएं

health services भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का विकास बहुत ही असमान रहा है। शहरी लोगों पर ज़्यादा ध्यान दिया गया है और गॉंवों को नज़रअंदाज़ किया गया है। इसके अलावा, गॉंवों में स्वास्थ्य सेवाओं की समस्या के कई पहलू हैं। ज़्यादातर देशों में स्वास्थ्य सेवाएं सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई जाती हैं परन्तु भारत में इसका बहुत बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा मिलता है।

सार्वजनिक क्षेत्र में मुख्यत: बचाव संबंधी सेवाओं जैसे टीकाकरण का काम होता है। वैसे भी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं काफी सीमित हैं। लोग मंहंगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर रहने को मजबूर हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्र नियंत्रित नहीं है। इलाज ढंग का नहीं होता और उसके लिए बहुत ज़्यादा पैसा वसूला जाता है। अकसर बिना ज़रूरत के दवाएं दे दी जाती हैं। जब शुरूआत में स्वास्थ्य सेवाओं का विचार सामने आया था तो यह लोगों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील था। भोरे कमीटी (१९४८) ने बहुत विस्तृत सुझाव दिए थे जिन्हें भारत सरकार ने मान भी लिया था। पर इन्हें कभी भी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। इनमें से कुछ महत्वपूर्ण सुझाव ये थे –

  • सरकार को सभी को संपूर्ण और मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं (इलाज और बचाव) उपलब्ध करवानी चाहिए।
  • स्वास्थ्य सेवाएं धीरे धीरे अलग अलग चरणों में विकसित होंगी।
  • पहले हर ४०००० लोगों के लिए एक प्राथमिक स्वास्थ्य इकाई या केन्द्र होगा। और हर १००००० लोगों के लिये एक ७५ बिस्तरवाला अस्पताल।
  • हर ३० प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रोपर ५० बिस्तरों वाला अस्पताल बनाया जाना था।
  • हर जिला (१०-३० लाख आबादी) मुख्यालय में एक २४०० बिस्तर वाला अस्पताल और एक चिकित्सीय कॉलेज बनने चाहिए।
  • इन सुविधाओंके चलते हर १००० आबादीको ६-७ बेड और २-५ डॉक्टर मिल सकते थे। हम यह सब नहीं कर सके। इसके बजाय हम सिर्फ इतना कर सके की ४० हजार – १लाख आबादी में मुश्किलसे १ प्रा. स्वास्थ्य केंद्र लगवा सके। यह भी ३० बेड का नही बल्कि ६ बेड का ही बन सका।
  • महत्वपूर्ण बीमारियों जैसे तपेदिक, मलेरिया या हैजा आदि के नियंत्रण के लिए खास कार्यक्रम बनने चाहिए
  • लोगों के उन समूहों के लिए जो स्वास्थ्य की दृष्टि से खतरे में रहते हैं जैसे गर्भवती महिलाएं, बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद महिलाएं, खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे बच्चे और अन्य लोगों के लिए खास तरह के स्वास्थ्य कार्यक्रम लागू किए जाने थे।
  • सरकारी बजट का कम से कम १५ प्रतिशत सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में लगाया जाना चाहिए।
  • निवारक स्वास्थ्य सेवा चिकित्सीय शिक्षा का एक हिस्सा होना चाहिए।

आज की स्थिति में भोर कमीटी की रिपोर्ट बहुत ही भारीभरकम लगती है। आज मौजूद स्वास्थ्य सेवाएं इस से बहुत कम ही मेल खाती हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की हालत बेहद खराब है, २०,००० से ३०,००० लोगों के पीछे केवल एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। किसी किसी राज्य में तो १,००,००० लोगों के पीछे एक प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। इसके अलावा ग्रामीण अस्पताल तो चलने की हालत में ही नहीं हैं। जिला स्तर के अस्पतालों में औसतन ३००० बिस्तर हैं जबकि भोरे कमीशन में २४०० बिस्तरों वाले अस्पतालों की सिफारिश की गई थी। दूसरी ओर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकारी बजट बहुत ही कम रहा है। अपर्याप्त सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की जगह निजी स्वास्थ्य सेवाओं ने भरी है जिनका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा कमाना है।

ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएं

Rural Health Servicesग्रामीण इलाकों में रह रहे लोगों पर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव का सबसे बुरा असर पड़ा है। चिकित्सा और स्वास्थ्य के पुराने और पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है जबकि ये आसानी से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जोड़ी जा सकती थीं। इलाज और स्वास्थ्य के पारंपरिक तरीकों को ध्यान से आगे बढ़ाना चाहिए, जैसा कि चीन में किया गया है। पुराने इलाज आमतौर पर स्थानीय जडिबूटियोंसे मिल जाते हैं। इसलिए उतने मंहंगी भी नहीं होतीं। इन तरीकों में लोगों के सांसकृतिक विश्वासों को भी महत्व दिया जाता है।

दूसरी ओर, ग्रामीण क्षेत्रों में ज़्यादातर होम्योपैथी या आयुर्वेद में प्रशिक्षित निजी डॉक्टर होते हैं। पर ये लोग बिना पूरी जानकरी के ऐलोपैथिक दवाएं देते हैं। साथ ही निजी स्वास्थ्य सेवाएं मंहंगी हैं। एक बीमार व्यक्ति काम नहीं कर पाता इसलिये परिवार की आमदनी घटती है। ऐसे में मंहंगे इलाज से बोझ और बढ़ जाता है। दूर दराज में स्वास्थ्य केन्द्र तक जाने में किराया आदि भी खर्च होता है। दूसरी ओर होम्योपैथी या आयुर्वेद आधुनिक इलाज (ऐलोपैथी) से सस्ते होते हैं, परन्तु गॉंवों में मौजूद स्वास्थ्यकर्मी उनका बहुत ही कम इस्तेमाल करते हैं।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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