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त्रिदोष सिद्धान्त

हम सभी के गठन में तीन दोष यानि प्रकृतितत्व होते हैं। इन में से जो भी प्रबल होता है वही हमारे शरीर का गठन निर्धारित करता है। हम अलग अलग तरह के शारीरिक गठन, जिसे प्रकृति कहते हैं, के बारे में पढ़ेंगे। पृथ्वी और पानी मिल कर कफ बनाते हैं। तेज से पित्त बनती है। वायु और आकाश से वात होता है। कफ, पित्त और वायु को तीन दोष कहा जाता है।

वात प्रकृति

जिन लोगों में वात सबसे प्रबल होता है वो पतले, हल्के, फुर्तीले होते है और उसकी त्वचा सूखी होती है। वो अक्सर बेचैन होते हैं। उनकी भूख बदलती रहती है और वो ज़्यादा आसानी से बीमार पड़ जाते हैं। उनका कल सूखा होता है इसलिए उन्हें कब्ज़ बहुत होता है। वो गर्म खाना पसन्द करते हैं और ठण्डी चीज़ें सख्त नापसन्द करते हैं। वा सर्दियों में हमेशा गर्म ऊनी कपड़े पहनना पसन्द करते हैं। इन लोगों में त्वचा की ऊपरी शिराएँ काफी प्रबल होती है। शरीर का मॉंसल भाग भी मुलायम होने की जगह सख्त होता है।

पित्त प्रकृति

पित्त दोष वाले लोगों को गर्मियॉं सख्त नापसन्द होती हैं। अन्य तरह के लोगों की तुलना में उनकी त्वचा गर्म होती है। और उनके शरीर के मॉंसल हिस्से मुलायम होते हैं। उन्हें हर मौसम में खूब भूख लगती है और उनकी पाचन शक्ति भी अच्छी होती है। वो ज़्यादा समय तक भूखे नहीं सह सकते। अक्टूबर उनके बीमार होने का महीना होता है। उनका मस्तिष्क बहुत तेज़ी से काम करता है। और उन्हें नए नए विचार आते रहते हैं। ये लोग गुस्से वाले होते हैं। उन्हें पाचन तंत्र की बीमारियॉं बहुत कम होती हैं।

कफ़ प्रकृति

जिन लोगों में कफ प्रबल होता है वो बलवान होते हैं। ये लोग कसरत और शारीरिक काम पसन्द करते हैं। उन्हें गर्मी पसन्द होती है। उन्हें कम खाना और लगातार काम करना पसन्द होता है। वे शांत और खुश रहने वाले होते हैं और अच्छी तरह से सोते हैं। कफ प्रबल लोगों को बीमारियॉं कम होती हैं।

मिश्रित प्रकृति

प्रकृति के इन प्रमुख प्रकारों के अलावा इन सब के गठजोड़ से और बहुत सारी प्रकृतियॉं बनती हैं। एक ही व्यक्ति में भी मौसम और उम्र के हिसाब से दोषों के सिद्धान्तों के अनुपात बदलते रहते हैं। सर्दियों और बारिश के दिनों में कफ अधिक प्रबल होते हैं और गर्मियों में वात। इसी तरह एक बच्चे में कफ ज़्यादा होता है और बूढ़ों में वात ज़्यादा होता है। इन अलग अलग प्रकार की प्रकृतियों को पहचानना ज़रूरी है क्योंकि स्वास्थ्य और बीमारियॉं इन्हीं से नियंत्रित होती हैं। आयुर्वेद मुख्यत: इसी समझ पर निर्भर करता है। दोषों पर असर डालने वाले कारक खाने से अलग अलग चीज़ें शरीर में इन दोषों को कम या ज़्यादा करती हैं।

कफ़

खाने की वो चीज़ें जो चिपचिपी होती हैं (उड़द/चावल आदि), अनाज का आटा जो गीला होने पर चिपचिपा होता है (जैसे गेहूँ का आटा), गुड़, मिठाइयॉं, मीठा दही और दही कफ पैदा करते हैं। ठण्डा पानी, ठण्डा मौसम, आराम, ज़्यादा सोने से भी कफ पैदा होता है। कुछ चीज़ों से कफ कम होता है। जैसे मक्का, मक्के का दूध, काली मिर्च, हींग का उबला हुआ पानी और मिर्च शहद से भी कफ कम होता है। |

वात

बहुत सी दालें और दलहन वात पैदा करते हैं। इस तरह से मटर वात पैदा करती है। जिन फलों में से काटने पर पानी निकलता है (जैसे कि मीठा कद्दू) उनसे भी वात होता है। कड़वी, तिखी और ठंडी चीज़ें भी वात पैदा करती हैं। वात पैदा करने वाली खाने की चीज़ें आमतौर पर कफ पैदा करने वाली चीज़ों के मुकाबले कम पोषक होती हैं। वात पैदा करने वाली चीज़ों से मल सूखा हो जाता है। जिससे कब्ज़ हो जाता है। मीठी चीज़ें, वसा और तेल, नमक, आसानी से पचने वाली चीज़ें, गेहूँ और काले चने आदि और तेल की मालिश से वात शामक है।

पित्त

पीले व लाल फल जैसे पपीता, आम (पर रस वाले फल नहीं), तेज़ स्वाद वाली खाने की चीज़ें, तीखी, गर्म और खट्टी खाने की चीज़ें, खमीर वाली चीज़ें, अचार, शराब, बासी खाना, मसाले, मसालेदार खाना, चाय और कॉफी पित्त पैदा करते हैं। गर्म धूप या आग के पास बैठने से भी पित्त बढ़ता है। पित्त प्रकृति के लोगों में अन्य लोगों की तुलना में बीमारी तेज़ी से बढ़ती और बिगड़ती है। ऐसे लोगों को बीमारी को जल्दी ठीक करने के लिए मीठी या कड़वी चीज़ें खानी चाहिए।

प्रकृतिपर ध्यान दें

चिकित्सीय अभ्यास में अवलोकन करने और अनुभवों को एक दूसरे से जोड़ कर देखने से त्रिदोषों की समझ बन जाती है। इस तरह की जानकारी से हमें मरीज़ों को प्रबल दोषों के आधार पर वर्गीकृत करने में मदद मिल जाती है। चिकित्सीय उपचार के साथ इसके मिलने से आप अपने मरीज़ों को बेहतर और जल्दी आराम पहुँचा सकते हैं। कभी-कभी आप खुद देखेंगे कि जो बीमारियॉं दोषों पर निर्भर करती हैं वो तब तक ठीक नहीं होतीं जब तक इन सिद्धान्तों पर ध्यान न दिया जाए। ये भी सम्भव होता है कि दोषों से जुड़ी बीमारियॉं दो दोषों को दूर करने व थोड़ी बहुत दवाइयों से ही ठीक हो जाएँ।

इन पदार्थो से दोष ठीक होते है।

दोषों के सिद्वातों के अनुसार छिलके समेत मूँग पूर्ण सन्तुलित आहार है और तेज़ी से ठीक होने में मदद करता है।

बीमारियों का वर्गीकरण

आयुर्वेद में बीमारियों को दोषों के अनुसार समूहों में बॉंटा जाता है।

  • कफ प्रबल बीमारियॉं धीरे धीरे बढ़ती हैं जिन में बुखार और दर्द कम होता है। ये बीमारियॉं ठीक भी जल्दी होती हैं।
  • वात बीमारियों मे इन में से कोई न कोई लक्षण होत हैं: वजन घटना, त्वचा या हाथ पैर का क्षरण होना, दौरे पड़ना, बीमारी की बढ़ना और बिगड़ना, नींद न आना और दर्द।
  • पित्त प्रबल दोषों में लाल या पीला पड़ना, खास कर उन जगहों पर जो बाहर की ओर खुलते हैं जैसे मुँह, नाक मलद्वार आदि। इसके साथ जलन होती है। बुखार होता है और बीमारी व्यक्ति को कमज़ोर कर देती है। पीप भी बनती है। अचानक लकवा मार जाता है या शरीर के कोई भाग काम करना बन्द कर देता है।

अलग अलग दोषों की बीमारियों के लिए अलग अलग उपचार सुझाए गए हैं। वात बीमारियों में आराम और तेल के इलाज से फायदा होता है। वात बीमारियों में शारीरिक काम और कसरत, खाली पेट रहने और शहद से इलाज में मदद मिलती है। पित्त दोषों में घी का उपयोग करने की ज़रूरत होती है। पित्त बीमारियों के लिए लगातार देखभाल की ज़रूरत होती है।

 

डॉ. शाम अष्टेकर २१, चेरी हिल सोसायटी, पाईपलाईन रोड, आनंदवल्ली, गंगापूर रोड, नाशिक ४२२ ०१३. महाराष्ट्र, भारत

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